। नीचे हिंदी में इसके महत्व और पढ़ने के तरीके की पूरी जानकारी दी गई है:
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ऐतिहासिक संदर्भ और प्रामाणिकता
"Ziarat e Nahiya" नाम से मोबाइल ऐप्स भी उपलब्ध हैं जो अनुवाद और ऑडियो की सुविधा देते हैं . ziyarat e nahiya in hindi
ज़ियारत-ए-नाहिया केवल शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि यह इमाम-ए-ज़माना (अ.स.) के दिल की आवाज़ है। इसे हिंदी में पढ़ने और समझने से हमें कर्बला के असल मक़सद और अहल-ए-बेत के सब्र का अंदाज़ा होता है। मुहर्रम और अज़ादारी के दिनों में इस ज़ियारत को समझकर पढ़ना हमारे ईमान को ताज़ा करता है और हमें अपने ज़माने के इमाम से जोड़ता है।
आजकल डिजिटल दौर में इस पवित्र ज़ियारत को पढ़ना और समझना बहुत आसान हो गया है। आप नीचे दिए गए साधनों का इस्तेमाल कर सकते हैं:
इसे पढ़ने का सबसे उत्तम समय "अरबाeen" (चेहल्लुम) माना जाता है, जो इमाम हुसैन की शहादत के ४० दिन बाद आता है। हालांकि, इसे किसी भी समय और किसी भी स्थान से पढ़ा जा सकता है, लेकिन कर्बला में इमाम के रौज़े के बिल्कुल पास (नाहिया) खड़े होकर पढ़ने का विशेष महत्व है। Can’t copy the link right now
पैगंबर के परिवार के प्रति अटूट निष्ठा।
मैं गवाही देता हूँ कि आप शहीद हुए, और आपके अहले-बैत (परिवार) को कैद किया गया, और आपके खून को बहाया गया अत्याचारियों क
: If you cannot read Arabic fluently, ensure the Hindi text includes the Arabic-to-Hindi transliteration . This allows you to recite the original Arabic words using Hindi script. their policies apply.
प्रसिद्ध विद्वानों ने इस ज़ियारत को प्रामाणिक बताया है:
ज़ियारत-ए-नाहिया का अर्थ है "नाहिया की यात्रा"। नाहिया का अर्थ है "दूरी" या "दूर का स्थान"। यह यात्रा इमाम हुसैन के मकबरे पर जाकर की जाती है, जो कर्बला में स्थित है। यह यात्रा शिया मुसलमानों के लिए बहुत पवित्र मानी जाती है, क्योंकि इमाम हुसैन शिया मुसलमानों के तीसरे इमाम थे और उन्होंने अपने परिवार के साथ कर्बला में शहीद हो गए थे।
इस ज़ियारत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इमाम इसमें कर्बला की जंग और इमाम हुसैन की शहादत का बहुत ही दर्दनाक और विस्तृत वर्णन करते हैं। इसमें इमाम की प्यास, उनके जख्मों और उनके घोड़े (ज़ुलजिनाह) की वापसी का उल्लेख मिलता है。
इसकी शुरुआत अल्लाह के पैगंबरों (जैसे हज़रत आदम, नूह, इब्राहीम, मूसा, ईसा) और विशेष रूप से इस्लाम के अंतिम पैगंबर हज़रत मुहम्मद (स.अ.व.व.) और उनके पवित्र परिवार (अहल-ए-बैत) को सलाम करने से होती है। यह इस बात का प्रतीक है कि इमाम हुसैन (अ.स.) का बलिदान, पैगंबरों की उसी श्रृंखला की कड़ी है जिसने सत्य और न्याय के लिए संघर्ष किया।